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Wednesday, December 19, 2012


कहाँ थी माँ शेराँ वाली जब दिल्ली में इतना घृणित काण्ड हो रहा था
उठो...जागो....अभी भी वक़्त है
अंधविश्वासों ..... अंधी श्रधाओं...
पाखंडी धर्मों ....... से कोइ सुधार नहीं होने वाला

अगर मंदिर जाने से कोई धार्मिक हो सकता तो दुनिया न जाने कितनी बार धार्मिक बन गयी होती
जितने मन्दिर......... मस्जिद............ गुरुद्वारे............. मत.............मठ...............
आज इस दुनिया में हैं पहले कभी नहीं थे
और जितनी अधिक अधार्मिक दुनियां आज है इतनी अधार्मिक भी कभी नहीं थी
इसका सीधा सा अर्थ है
या तो ये धर्म हमें अधार्मिक बना रहे हैं ..............
या वास्तव में ये सच्चे अर्थों में सही धर्म नहीं हैं

इस लिए आवाहन है मेरा सभी से

आओ ऐसे धर्म...समाज की सृजना करें
जो सही मायनों में धार्मिक हो .......पवित्र हो